लोग डीपी बॉस किसे कहते हैं?
एक विभाग को नहीं। एक अधिकारी को नहीं। सालों से चार्ट और पुराने आंकड़े दिखाने वाले पेजों के झुंड को लोग इस नाम से पुकारने लगे। खोजने वाला लिखता है सट्टा मटका डीपी बॉस या Satta Matka क्योंकि उसके दोस्त ने वही नाम बोला था। नाम चल निकला। चलते नाम को लोग स्रोत मान लेते हैं।
क्या यह कोई लाइसेंस प्राप्त पोर्टल है?
सार्वजनिक कागजात में ऐसा कोई सरकारी मटका बोर्ड नहीं मिलता जो रोज ओपन क्लोज निकालता हो। जो पेज दिखते हैं, वे निजी हैं। डोमेन बदलते हैं। डिजाइन एक जैसा रहता है। तालिकाएं कॉपी होती हैं। इसलिए एक नाम के कई ठिकाने एक साथ जीते हैं।
चार्ट देखने की आदत कहां से आई?
कागज से। पुराने बाजार में पन्ना दीवार पर चिपकता था। लोग पिछले हफ्ते की लाइन देखकर अंदाजा लगाते थे। मोबाइल ने उसी पन्ने को हमेशा जेब में रख दिया। आदत बनी रही। माध्यम बदल गया।
पैटर्न दिखना क्या सबूत है?
नहीं। लंबे आंकड़ों में आंख को कोई न कोई दोहराव मिल जाता है। दोहराव से नियम बनाना जुए की पुरानी कमजोरी है। नियम एक सप्ताह चलता है। दूसरे सप्ताह टूटता है। टूटने के बाद नया नियम गढ़ लिया जाता है। चार्ट इसीलिए कभी खत्म नहीं होता। वह अगले नियम का कच्चा माल देता रहता है।
सट्टा मटका और ये चार्ट एक ही चीज हैं क्या?
नाम जुड़ा है। चीज जुदा है। बाजार दांव का है। चार्ट उस दांव की पिछली घोषणाओं का ढेर है। ढेर को देखकर लोग भविष्य पढ़ना चाहते हैं। भविष्य पढ़ने का औजार चार्ट को बना देता है। फिर भी घोषणा निजी ही रहती है। सट्टा मटका शब्द इतिहास, बाजार और खोज तीनों को ढोता है। चार्ट केवल आखिरी हिस्से को खिलाता है।
लीक और फिक्स वाले संदेश क्यों आते हैं?
क्योंकि जल्दी के लालच पर संदेश टिकते हैं। पुराने समय में भी कोई कहता था कि आज पक्का है। पक्का शब्द महंगा शब्द है। वह पैसे खींचता है। जब पक्का टूटता है तो संदेश करने वाला गायब रहता है। नया नंबर, नया ग्रुप। यही दोहराव अब टेलीग्राम पर दिखता है।
ऐप और पेज में फर्क कितना है?
स्क्रीन का फर्क ज्यादा है, काम का कम। ऐप सूचनाएं भेजता है। पेज खोले जाने की मांग करता है। दोनों आंकड़ा दिखाते हैं। दोनों विज्ञापन चलाते हैं। दोनों अक्सर एक दूसरे पर भरोसा करने को कहते हैं। भरोसे का कागज नहीं होता। केवल बटन होता है।
पुलिस छापे से नाम क्यों नहीं मरते?
क्योंकि नाम सर्च में बस चुका है। सर्वर पकड़ा जा सकता है। शब्द नहीं पकड़ा जाता। शब्द फिर किसी और पते पर बैठ जाता है। इसीलिए सफाई के बाद भी वही खोज बनी रहती है। लोग पुराना नाम टाइप करते हैं। नया पेज खुल जाता है।
घर वाले चार्ट को क्यों नहीं समझ पाते?
क्योंकि तालिका खेल जैसी लगती है। रंगीन खाने। पुरानी तिथियां। कोई गाली गलौज नहीं। कोई हथियार नहीं। दिखने में हिसाब की कॉपी लगती है। हिसाब की कॉपी जब रोज खुलने लगे तो परिवार देर से पूछता है कि यह किस काम की शीट है। तब तक उधार चल चुका होता है।
अगर चार्ट बंद कर दें तो क्या बाजार रुक जाए?
कागज के चार्ट बंद हुए तो बाजार नहीं रुका। वह फोन पर चला गया। फोन से ऐप पर चला गया। सूचना का रास्ता बंद करने से चाहत नहीं मरती। चाहत तब कम होती है जब घर का हिसाब सामने आता है और नुकसान छिपता नहीं। चार्ट बंद करना उपचार नहीं, केवल एक पर्दा हटाना है।
क्या कोई सुरक्षित चार्ट होता है?
आंकड़ा देखना और दांव लगाना अलग काम हैं। लेकिन ज्यादातर लोग चार्ट इसलिए खोलते हैं कि अगला कदम तय करें। कदम दांव का है तो सुरक्षित वाला शब्द बेईमान हो जाता है। सूचना अपने आप निरपराध लगती है। उपयोग उसे बाजार में खींच लेता है।
अंत में क्या रह जाता है?
एक लोकप्रिय नाम। ढेर सारी तालिकाएं। और वह भ्रम कि जो चीज इतने सालों से खुल रही है, वह शायद मान्य होगी। मान्यता भीड़ से नहीं आती। कागजात से आती है। कागजात यहां गायब हैं। नाम बाकी है। उलझन इसी से पैदा होती है।
नाम की वर्तनी क्यों इतनी टूटती है?
डीपी बॉस, डी पी बॉस, डीपीबोस। लोग जल्दी टाइप करते हैं। पेज सभी वर्तनी पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं। वर्तनी की गलती भी ट्रैफिक बन जाती है। इससे पता चलता है कि स्रोत की सटीकता मकसद नहीं, पहुंच मकसद है।
क्या पुराने चार्ट मिटाए जा सकते हैं?
कागज जल सकता है। स्क्रीन की नकल बच जाती है। कोई पेज हटाए तो दूसरा उसी तालिका को चढ़ा लेता है। इसलिए मिटाने का विचार अधूरा रहता है। जो चीज कई पतों पर बैठी हो, वह एक कुंजी से नहीं जाती।
लोग बॉस शब्द से क्या समझते हैं?
अधिकार। नियंत्रण। अंतिम बात। शब्द जानबूझकर भारी है। भारी शब्द भरोसा उधार लेता है। कोई बॉस है तो शायद व्यवस्था है। व्यवस्था का भ्रम चार्ट को सरकारी मुहर के करीब ले आता है। करीब ले आना और मुहर होना दो काम हैं।
महिलाएं चार्ट क्यों खोलती हैं?
कई बार घर के आदमी ने कहा देख लो। कई बार कर्ज के बाद खुद पता करने की कोशिश। कुछ मामलों में वे उसी चक्र में चली जाती हैं। चार्ट लिंग नहीं देखता। वह केवल खुलता है। खुलने के बाद फैसला व्यक्ति का रहता है, दबाव घर का रहता है।
क्या चर्चा मात्र से नुकसान होता है?
चर्चा से हमेशा नुकसान नहीं होता। छिपाना ज्यादा नुकसान करता है। छिपा चार्ट, छिपा उधार, छिपा फोन। जब बात सामने आती है तब भी गुस्सा आता है, लेकिन हिसाब शुरू हो सकता है। चार्ट की उलझन का इलाज और चार्ट निकालना है, और घर से झूठ निकालना है।
क्या चार्ट को समाचार कहा जा सकता है?
समाचार की एक शर्त स्रोत की जांच है। चार्ट पेज आमतौर पर एक दूसरे को स्रोत बनाते हैं। एक गलती कई स्क्रीन पर फैल जाती है। इसलिए इसे समाचार की तरह उद्धृत करना कमजोर काम है। विषय की खबर लिखनी हो तो छापा, केस, और सार्वजनिक बयान देखो। तालिका को उद्धरण मत बनाओ।
खोज से कैसे बाहर निकलें?
फोन की हिस्ट्री साफ करना काफी नहीं। ग्रुप छोड़ना, ऐप हटाना, और किसी भरोसे के व्यक्ति को खर्च बताना ज्यादा काम का है। खोज बार आदत से भर जाता है। आदत टूटती है जब सुबह का पहला काम चार्ट न हो। यह वाक्य सरल है। पालन कठिन है। कठिन काम ही बाहर निकालता है।